: योग्यता पर भी विचार कर लेना चाहिए जिससे परियोजना का मूल्यांकन एवं विश्लेषण करके प्रतिवेदन तैयार

योग्यता पर भी विचार कर लेना चाहिए जिससे परियोजना का मूल्यांकन एवं विश्लेषण करके प्रतिवेदन तैयार

योग्यता पर भी विचार कर लेना चाहिए जिससे परियोजना का मूल्यांकन एवं विश्लेषण करके प्रतिवेदन तैयार किया जाना चाहिए। (ii) बाजार परिस्थितियों परियोजना की आर्थिक साध्यता में उत्पादित होने वाली वस्तु या सेवा की बाजा परिस्थितियों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए जिसके अन्तर्गत वस्तु की स्वीकार्य दर, प्रतियोगी वस्तुओं में प्रतिस्पर्द्धा की मात्रा स्थानापन्न वस्तुओं की उपलब्धता, माँग और पूर्ति की स्थिति, विज्ञापन एवं विक्रय सम्बर्द्धन का प्रभाव, प्रतियोगी तथा प्रतिस्थापन वस्तुओं की कीमतें इत्यादि सम्मिलित है। (iv) आयात प्रतिस्थापन्न एवं निर्यात सम्भावनाएँ आर्थिक साध्यता का विश्लेषण करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आयात की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा एवं जो उत्पादित वस्तु के प्रतिस्थापन के रूप में हो जो वस्तु के बाजार को प्रभावित करती हो, दूसरी तरफ निर्यात को जाने वाली वस्तुओं मात्रा जो वस्तुओं के स्थानापन वस्तु के रूप में हो और इसका निर्यात किए जाने पर वस्तु की माँग प्रभावित होती हो जिससे वस्तु के विक्रय में वृद्धि होती है। इस प्रकार वस्तुओं के आयात एवं निर्यात सम्बन्धी नीति सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है जिससे • वस्तु की माँग और पूर्ति प्रभावित होती है। इस प्रकार परियोजना का मूल्यांकन करते समय उन सब बातों से अवश्य अवगत हो लेना चाहिए। (v) उत्पाद की माँग एवं प्रतिस्थापन वस्तुओं का प्रभाव उत्पादन की मांग और पूर्ति का अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि बिना मांग के वस्तुओं का उत्पादन एवं वितरण का कार्य नहीं किया जा सकता इसलिए यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि भविष्य में वस्तुओं की माँग में और वृद्धि होगी या कमी होगी, वस्तु की स्थानापन्न वस्तुओं की भी जांच की जानी चाहिए जिससे वह मालूम किया जा सके कि उत्पादित वस्तुओं की माँग को किस सीमा तक प्रभावित कर सकती है और उत्पादित वस्तु की श्रेणी में कितने निर्माताओं की वस्तु बाजार में उपलब्ध है, क्योंकि ये उत्पादित वस्तु के बाजार में ही अपना हिस्सा बटायेंगे जिससे वस्तु की माँग को प्रभावित कर सकते है। कभी-कभी वस्तुओं की मांग और कीमत में वृद्धि होने पर सरकार द्वारा अपने नियन्त्रण में लेकर वस्तुओं का उत्पादन और मूल्य का निर्धारण कर लिया जाता है। कभी-कभी माँग मौसमी होती है जिससे वस्तु की माँग केवल किसी खास मौसम में ही की जाती है और कभी-कभी व्यावसायिक उच्चावचन से भी माँग में कमी या वृद्धि हो जाती है तथा कभी उत्पादन किन्हीं कारणों से कम होने पर वस्तुओं की माँग में वृद्धि होने लगती है। इसलिए परियोजना की आर्थिक या वाणिज्यिक साध्यता की जाँच एवं विश्लेषण करते समय वस्तु की प्रकृति एवं सेवा को ध्यान में रखकर उसकी माँग और पूर्ति पर होने वाले अल्पकालिक एवं दीर्घकालीन प्रभावों का बहुत गहनतापूर्वक जांच एवं मूल्यांकन किया जाना चाहिए। (vi) उपभोक्ता की आय एवं रहन-सहन का स्तर उपभोक्ता की आय एवं बचत तथा उनके रहन-सहन का स्तर आदि की जाँच-परख की जानी चाहिए। अगर लोगों का रहन-सहन का स्तर ऊंचा है और आप अधिक है तो उच्च किस्म की ऊंची कीमत पर वस्तुओं को विक्रय किया जा सकता है, नहीं तो कम मूल्य की वटिया किस्म की वस्तुओं का निर्माण किया जाना चाहिए। इस प्रकार प्रस्तावित परियोजना आर्थिक साध्यता के मूल्यांकन के हिसाब से ठीक है, तभी परियोजना के क्रियान्वयन का निर्णय लिया जाना चाहिए। प्रश्न 4. वित्तीय साध्यता (financial feasibility) का वर्णन कीजिए। उत्तर वित्तीय साध्यता Financial Feasibility वित्तीय साध्यता के अन्तर्गत प्रस्तावित परियोजना में वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में वित्त की व्यवस्था है या नहीं, क्योंकि परियोजना की सफलता पर्याप्त मात्रा में वित्त की मात्रा पर निर्भर करती है, परियोजना के वित्तीय साध्यता के अन्तर्गत यह भी मूल्यांकन किया जाना चाहिए कि परियोजना के अल्पकालीन और दीर्घकालीन वित्त व्यवस्था में उचित मात्रा में उचित समय पर उचित व्याज पर प्राप्त होती रहेगी। वित्तीय संस्थाएं तथा बैंक उन्हीं परियोजनाओं को ऋण देने के लिए आकर्षित होती हैं जिनकी वित्तीय स्थिति काफी मजबूत होती है तथा जिनमें सम्भावित लाभ की मात्रा अधिक होती है तथा बाह्य दायित्वों जैसे बैंक या अन्य वित्तीय संस्थाओं के ऋण भुगतान करने में समर्थ हो तथा यह भी देखना चाहिए कि परियोजना में कुल पूँजी व्यय कितनी मात्रा में होगा जिसके लिए वित्त की कितनी मात्रा की आवश्यकता होगी जिसमें परियोजना के प्रारम्भिक प्रवर्तन एवं संगठनात्मक सम्बन्धी लागतों के साथ-साथ अल्पकालीन तथा दीर्घकालीन वित्तीय आवश्यकताओं का भी पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए। इस प्रकार परियोजना को विभिन्न मदों में विनियोजित होने वाली पूँजी की आवश्यकताओं का अलग-अलग विचार-विमर्श करने के बाद ही पूंजी की आवश्यकताओं का अन्तिम रूप से निर्धारण किया जाना

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