: आर्थिक जीवन पर प्रभाव

आर्थिक जीवन पर प्रभाव

निरन्तर आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहा था, इससे उन जा रहा था, उनके भौतिक सुख-साधन बढ़ने लगे थे और वे धन के बल पर विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे थे।

आर्थिक जीवन पर प्रभाव

. पूँजीवाद का विकास औद्योगिक क्रान्ति ने आर्थिक जनजीवन का स्वरूप ही बदल दिया, जिससे राज्य की आय भी बढ़ी। उद्योगो के स्वामियों के पास धन की निरन्तर अभिवृद्धि हो रही थी। आर्थिक जीवन में छोटे व्यवसायियों का महत्त्व घट रहा था और उनके पास धन का • समाजवाद का विकास अभाव रहने लगा था। किसी भी देश के आर्थिक स्तर का मापदण्ड उसके विशाल उद्योगों को ही स्वीकार किया जाने लगा। फलस्वरूप पूँजीवाद का विकास होता गया।

आर्थिक जीवन पर प्रभाव

पूंजीवाद का विकास

कृषि एवं यातायात के संसाधनों में

क्रान्ति राष्ट्रीय आय में वृद्धि

जीवन स्तर में वृद्धि

आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता

कृषि एवं यातायात के संसाधनों में क्रान्ति औद्योगिक क्रान्ति का सबसे उपयोगी और व्यापारिक प्रभाव यह रहा कि इससे कृषि-जगत् और यातायात के संसाधनों में क्रान्ति आ गई। कृषि यन्त्रों की सहायता से खाद्यान्नों के उत्पादन में कई गुना वृद्धि हुई और कृषकों की दशा में विशेष सुधार हुआ। परिवहन के साधनों की नवीन खोजें एवं विकास ने कार्यों की गति को तीव्रता प्रदान कर दी एवं परिवहन को अधिक सुगम एवं विकसित बना दिया।

राष्ट्रीय आय में वृद्धि इस क्रान्ति के कारण विभिन्न देशों में तीव्र गति से औद्योगीकरण हुआ। देश एवं विदेशों में बड़े पैमाने पर तैयार माल बेचा जाने लगा। व्यापार में वृद्धि होने से राष्ट्रीय आय में भी भारी वृद्धि हो गई।

• जीवन स्तर में वृद्धि इस क्रान्ति के कारण आजीविका के साधनों में भारी वृद्धि हो गई, जिससे नागरिकों की आय बढ़ गई। प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि हो जाने के कारण मध्यम वर्गीय लोग भी महँगी और पहले की अपेक्षा अधिक वस्तुओं का उपयोग करने लगे, जिससे उनके रहन-सहन के स्तर में सुधार आ गया परिणामस्वरूप नागरिकों का जीवन स्तर ऊँचा उठ गया।

आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता इस क्रान्ति ने आर्थिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की स्थिति बना दी। अब नागरिक सुखी एवं वैभवपूर्ण जीवनयापन करने लगे फलस्वरूप जनसंख्या तीव्रगति से बढ़ने लगी। विशेषतः नगरों में श्रमिकों का जमाव हो जाने के कारण नगरीय जनसंख्या अधिक हो गई।

• समाजवाद का विकास समाजवादियों ने श्रमिकों में इस भावना का विकास किया कि उनके जीवन में परिवर्तन लाने के लिए समाजवादी व्यवस्था की आवश्यकता है। समाजवादी मान्यता के अनुसार समस्त कारखानों, भूमि तथा अन्य साधनों पर जनसंख्या का आधिपत्य होना चाहिए।

• इस प्रकार हम देखते हैं कि किसी भी क्रान्ति के प्राय: दो पहलू होते हैं- एक . सकारात्मक एवं दूसरा नकारात्मक। जहाँ औद्योगिक क्रान्ति के कारण बड़े पैमाने पर उद्योगों एवं कारखाने स्थापित किए जा रहे थे, वहीं कुटीर उद्योग-धन्धों का विनाश हो रहा था। उद्योग एवं कारखानों की स्थापना से बड़े पैमाने पर जहाँ रोजगार के अवसर पैदा हो रहे थे वहीं सामाजिक जीवन में भी इस क्रान्ति के कारण अनेकों परिवर्तन दृष्टिगोचर प्रतीत हो रहे थे। लोगों के जीवन-स्तर में भी सुधार देखा जाने लगा।


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