• फ्रांसीसी कम्पनी पर सरकारी नियन्त्रण ब्रिटिश कम्पनी एक व्यक्तिगत कम्पनी थी और इसकी आर्थिक स्थिति बेहद सुदृढ़ थी, जबकि फ्रांसीसी कम्पनी एक सरकारी कम्पनी थी। यही कारण था कि फ्रांसीसी कम्पनी को छोटी-से-छोटी सहायता के लिए सरकार पर निर्भर रहना पड़ता था, जिसके परिणामस्वरूप फ्रांसीसी कम्पनी को समय पर सहायता नहीं मिल पाती थी।
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फ्रांसीसियों की पराजय के कारण सामुद्रिक शक्ति का कमजोर होना
• व्यापार की दयनीय स्थिति • फ्रांसीसी कम्पनी पर सरकारी नियन्त्रण
योग्य सेनापतियों का अभाव
फ्रांसीसियों में एकता का डूप्ले की फ्रांस वापसी
अभाव
अंग्रेजों द्वारा बंगाल की विजय काउण्ट डी लाली का
असहयोगात्मक स्वभाव डूप्ले द्वारा व्यापार के स्थान पर
साम्राज्य स्थापना का निर्णय लेना योग्य सेनापतियों का अभाव भारतीय शासकों का अपेक्षित
अंग्रेजों के पास रॉबर्ट क्लाइव,
सहयोग न मिलना
वॉरेन हेस्टिंग्स, एल्फिस्टन, मुनरो, फ्रांसीसियों की तुलना में अंग्रेज़ों वेलेजली जैसे उत्तम तथा कुशल श्रेणी के सेनापति तथा प्रशासनिक नेता थे, जबकि फ्रांसीसियों के को अधिक समृद्ध क्षेत्रों की प्राप्ति एवं कुशल श्रेणी के सेनापतियों एवं प्रशासनिक नेताओं का अभाव था। इसके अतिरिक्त अस्त्र-शस्त्र के मामलों में भी फ्रांसीसी अंग्रेजों से काफी कमजोर थे।
फ्रांसीसियों में एकता का अभाव अंग्रेजी कम्पनी के भारतीय उच्चाधिकारी उच्चकोटि के राजनीतिज्ञ और कुशल प्रशासक थे। फ्रांसीसी कम्पनी के डूप्ले, बुसी, लाली आदि में अनेक गुण थे, लेकिन अंग्रेजों के समान नहीं। फ्रांस के अधिकारियों में एकता का अभाव भी इनकी असफलता का कारण बना। डूप्ले की फ्रांस वापसी डूप्ले एक उच्च क्षमता एवं गुण वाला फ्रांसीसी अधिकारी था, लेकिन फ्रांसीसी सरकार के द्वारा डूप्ले को सम्मान देने के .
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स्थान पर इसे फ्रांस वापस बुला लिया गया, जबकि भारत में इसकी अत्यन्त
आवश्यकता थी। यदि यह कुछ समय तक भारत रहता, तो शायद फ्रांसीसी
साम्राज्य की सत्ता स्थापित करने में सफलता मिल जाती।
अंग्रेजों द्वारा बंगाल की विजय कर्नाटक के तृतीय युद्ध (1756-63 ई.) तक अंग्रेजों के द्वारा बंगाल पर विजय प्राप्त कर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया गया था। बंगाल से प्राप्त सुविधाओं के आधार पर मद्रास का अंग्रेज गवर्नर तीन वर्षों तक फ्रांसीसियों से सफलतापूर्वक युद्ध करता रहा था। इस प्रकार फ्रांसीसियों के पास संसाधनों का अभाव हो गया और पाण्डिचेरी का पतन हो गया। 1757 ई. में प्लासी के निर्णायक युद्ध में विजय प्राप्त हो जाने के बाद अंग्रेजों की स्थिति और सुदृढ़ हो गई।
काउण्ट डी लाली का असहयोगात्मक स्वभाव फ्रांसीसियों की हार के पीछे फ्रांसीसी सेनापति लाली भी एक कारण था, क्योंकि यह घमण्डी, जल्दबाज और क्रोधी स्वभाव का था, जिसके कारण इसे अन्य कर्मचारियों का सहयोग प्राप्त नहीं हो सका और अन्ततः फ्रांसीसी सत्ता की सम्भावना समाप्त हो गई।
डूप्ले द्वारा व्यापार के स्थान पर साम्राज्य स्थापना का निर्णय लेना डूप्ले भारत में व्यापार की उन्नति के उद्देश्य से आया था। यहाँ आकर उसने फ्रांसीसी साम्राज्य को स्थापित करने का विचार बना लिया, लेकिन इस सन्दर्भ में उसने सबसे बड़ी भूल यह की कि इस निर्णय से उसने फ्रांसीसी सरकार तथा अपने उच्च अधिकारियों को अवगत नहीं कराया। यह डूप्ले की सबसे बड़ी भूल थी, जिसके कारण फ्रांसीसियों की असफलता निश्चित हो गई।
भारतीय शासकों का अपेक्षित सहयोग न मिलना डूप्ले को उसके सहयोगी भारतीय शासकों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। द्वितीय कर्नाटक युद्ध के दौरान चाँदा साहब ने उसकी इच्छा के अनुसार समयानुकूल त्रिचनापल्ली पर चढ़ाई नहीं की और तंजौर की धनराशि प्राप्त करने के लिए ही संघर्ष करता रहा। परिणामस्वरूप त्रिचनापल्ली पर शीघ्र विजय प्राप्त नहीं की जा सकी। इसके पश्चात् जब चाँदा साहब ने त्रिचनापल्ली पर घेरा डाला तो भी उसने डूप्ले की इच्छा के विरुद्ध आधी सेना अर्काट भेज दी और अन्ततः इसका भी कोई सन्तोषजनक फल नहीं मिला।
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