उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश एवं सम्बन्धित राज्यों के राज्यपाल तथा अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय सम्बन्धित राज्य के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श करता है।
अनिवार्य अर्हताएँ
भारत के संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए कुछ अनिवार्य
अर्हताएँ निर्धारित की गई हैं, जो निम्नलिखित हैं
• वह भारत का नागरिक हो ।
• वह भारत के किसी न्यायिक पद पर कम-से-कम 10 वर्ष तक रहा हो या वह भारत के किसी न्यायालय अथवा न्यायालयों में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो।
• वह 62 वर्ष से कम आयु का हो।
पदावधि / कार्यकाल
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु पूर्ण होने तक अपना पद धारण कर सकते हैं अथवा इससे पूर्व न्यायाधीश राष्ट्रपति को सम्बोधित करके त्याग-पत्र दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर संसद के दोनों सदनों के बहुमत (कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत द्वारा) से (महाभियोग प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति से किसी न्यायाधीश को उसके पद से हटाए जाने की प्रार्थना कर सकते हैं और प्रार्थना प्राप्त होने पर राष्ट्रपति द्वारा उस न्यायाधीश को उसके पद से हटाया जा सकता है, परन्तु इसके लिए भी वही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने के लिए निर्धारित है।
उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
उच्च न्यायालयों को सामान्यतः सम्बन्धित राज्य क्षेत्र के अन्तर्गत कार्य करने की शक्ति प्राप्त होती हैं, हालाँकि न्यायिक क्षेत्राधिकार के साथ-साथ, इन्हें विभिन्न प्रशासनिक दायित्व भी पूर्ण करने पड़ते हैं, क्योंकि राज्य के अन्य सभी अधीनस्थ न्यायालयों के कार्यों की देखरेख तथा सुचारु रूप से संचालन का उत्तरदायित्व उच्च न्यायालय पर है।
प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार
इसमें उन मुकदमों को शामिल किया जाता है, जो सीधे उच्च न्यायालय में लाए जा सकते हैं, जो निम्नलिखित हैं
1. मूल अधिकारों के उल्लंघन से सम्बन्धित मुकदमों को सीधे उच्च न्यायालय में लाया जा सकता है। इसी कारण उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 में मूल अधिकारों के संरक्षण का दायित्व प्राप्त होता है। उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के संरक्षण के लिए पाँच प्रकार के रिट (Writs) जारी कर सकता है।
(i) बन्दी प्रत्यक्षीकरण (ii) परमादेश
(iv) अधिकार पृच्छा
(v) उत्प्रेषण
(iii) प्रतिषेध
2. उच्च न्यायालय न केवल मूल अधिकारों के सम्बन्ध में, बल्कि अन्य कानूनी/ वैधानिक अधिकारों के संरक्षण के लिए भी रिट जारी कर सकता है, जो इसकी शक्तियों को इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय से व्यापक बनाता है।
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