भारतीय संसद के कार्य
भारतीय संसद का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य देश के लिए कानून बनाना है। संसद को संघ सूची, समवर्ती सूची तथा विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। यद्यपि लोकसभा संसद का निम्न सदन है, किन्तु वह राज्यसभा से अधिक शक्तिशाली है। राज्यसभा बुद्धिजीवियों की सभा कही जाती है।
यह एक स्थायी सदन है जिसका विघटन नहीं होता है, बल्कि प्रत्येक दो वर्ष बाद 1/3 सदस्य अवकाश ग्रहण कर लेते हैं। संसद के कार्यों को निम्नलिखित तथ्यों द्वारा समझा जा सकता है।
. व्यवस्थापिका सम्बन्धी कार्य प्रत्येक विधेयक को विधि बनाने के पूर्व संसद की स्वीकृति अनिवार्य है। वित्त विधेयक (धन विधेयक) को छोड़कर अन्य कोई भी साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। वित्त विधेयक (धन विधेयक) सर्वप्रथम लोकसभा में ही पेश किया जाता है तत्पश्चात् राज्यसभा में यदि राज्यसभा 14 दिनों तक इस विधेयक पर अपनी मंजूरी नहीं देती है, तो इसे दोनों सदनों से पारित मान लिया जाता है। ऐसे विधेयकों पर राज्यसभा की कोई भी सिफारिश स्वीकार नहीं की जाती है। अनुच्छेद 108 के अन्तर्गत संयुक्त अधिवेशन आहूत करने का भी प्रावधान है।
कार्यपालिका पर नियन्त्रण संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका को व्यवस्थापिका के नियन्त्रण में कार्य करना पड़ता है। भारत में लोकसभा का कार्यपालिका अर्थात् मन्त्रिपरिषद् पर पूर्ण नियन्त्रण है। मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इस मामले में राज्यसभा कम शक्तिशाली है, क्योंकि सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में लाए जाते हैं।
संवैधानिक संशोधन सम्बन्धी कार्य लोकसभा को राज्यसभा के साथ मिलकर संविधान के किसी प्रावधान में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है। प्रत्येक सदन में कुल संख्या के बहुमत द्वारा तथा उस सदन में उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम-से-कम 2/3 बहुमत द्वारा पारित होने व राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद संशोधन प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है।
• महाभियोग लगाने का अधिकार संसद के दोनों सदनों में से कोई भी राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय अथवा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग लगा सकता है। महाभियोग प्रस्ताव दोनों सदनों में बहुमत से पारित होना चाहिए। महाभियोग प्रस्ताव पारित कर इन पदाधिकारियों को पद से हटाया जा सकता है।
1. निर्वाचक मण्डल के रूप में कार्य अनुच्छेद 54 के अन्तर्गत लोकसभा एवं
राज्यसभा के सदस्य विधानसभाओं के सदस्यों के साथ मिलकर राष्ट्रपति को
निर्वाचित करने हेतु निर्वाचन मण्डल का निर्माण करते हैं। अनुच्छेद 66 के
अनुसार उपराष्ट्रपति के चुनाव में लोकसभा एवं राज्यसभा की भूमिका अहम
होती है। उपराष्ट्रपति के चुनाव में दोनों सदनों के सदस्य शामिल होते हैं। • आपातकाल की घोषणा सम्बन्धी कार्य देश में आपातकाल की घोषणा लागू करवाने में संसद की अनुमति भी एक अनिवार्य तत्त्व है। अनुच्छेद 352, 356 एवं 360 के अन्तर्गत देश में या संवैधानिक तन्त्र विफल होने पर राज्यों में आपातकाल की घोषणा की जाती है। अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राज्यों में राष्ट्रपति शासन की घोषणा की जाती है। आपातकाल की परिस्थितियों के स्थायीकरण के लिए संसद की अनुमति अनिवार्य है, अन्यथा ये घोषणाएँ स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं।
संसद के उपरोक्त कार्यों में सिर्फ लोकसभा एवं राज्यसभा ही महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाते हैं, बल्कि राष्ट्रपति की भूमिका भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। राष्ट्रपति भी संसद का अंग होता है। अतः विधेयक पर उसी की मंजूरी अन्तिम मानी जाती है। उस अन्तिम मंजूरी के पश्चात् ही कोई विधेयक अधिनियम बनता है।
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