: इंग्लैण्ड की क्रान्ति का घटना

इंग्लैण्ड की क्रान्ति का घटना

इंग्लैण्ड की क्रान्ति का घटना

इंग्लैण्ड के राजा 'जेम्स द्वितीय' की कैथोलिक समर्थक नीति ने देश में क्रान्ति का वातावरण तैयार कर दिया था। देश के अधिकांश नेता प्रोटेस्टेण्ट के समर्थक थे। 15 नवम्बर, 1688 को देश के नेताओं ने हॉलैण्ड के प्रोटेस्टेण्ट राजा विलियम तृतीय (जेम्स द्वितीय का दामाद) को इंग्लैण्ड का ताज ग्रहण करने के लिए

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आमन्त्रित किया।

विलियम अपनी सेना के साथ 15 नवम्बर, 1688 को इंग्लैण्ड पहुँच गया। जनता की उत्तेजना देखकर राजा 'जेम्स द्वितीय' अपने परिवार सहित फ्रांस भाग गया। इसके भाग जाने पर संसद ने इंग्लैण्ड में हैनोवर वंश के प्रोटेस्टेण्ट राजा विलियम तृतीय (विलियम ऑफ ऑरेन्ज) और उसकी पत्नी मैरी (जेम्स द्वितीय की पुत्री) को संयुक्त रूप से राजगद्दी पर आसीन कर दिया। इस तरह संसद की विजय हुई और इंग्लैण्ड की रक्तहीन क्रान्ति सफल हुई।

इंग्लैण्ड की क्रान्ति के परिणाम

इंग्लैण्ड की इस क्रान्ति का विश्व इतिहास पर बड़ा दूरगामी व व्यापक परिणाम हुआ, जो इस प्रकार है

• राजा के दैवीय अधिकारों का अन्त इस क्रान्ति के पूर्व सारी शक्तियों का केन्द्र बिन्दु सम्राट होता था तथा अधिकतर सम्राट “राजा के दैवीय अधिकारों के

सिद्धान्त में विश्वास करते आ रहे थे। इस समय राजा अपनी इच्छानुसार शासन करते थे। इस क्रान्ति के द्वारा यह स्पष्ट कर दिया गया कि राजा का पद जनता

इंग्लैण्ड की क्रान्ति के परिणाम

• राजा के दैवीय अधिकारों का अन्त

• राजा की निरंकुशता पर प्रतिबन्ध . संसद की सर्वोच्चता की स्थापना

• स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना

यूरोप में क्रान्तियों का प्रचलन

इंग्लैण्ड में संसदीय शासन का विकास

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• राजा और संसद के संघर्ष का अन्त इंग्लैण्ड तथा फ्रांस में शत्रुता

की इच्छा पर निर्भर करता है न कि दैवीय अधिकार पर।"

राजा की निरंकुशता पर प्रतिबन्ध संसद के द्वारा 1689 ई. में बिल ऑफ राइट्स पारित किया गया। इसके माध्यम से राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगा दिया गया। इस प्रकार निरंकुशता समाप्त होने पर स्वतन्त्रता और समानता के आदर्शों की स्थापना की गई। यह भी सुनिश्चित कर दिया गया कि भविष्य में कोई भी ऐसा व्यक्ति इंग्लैण्ड का शासक नहीं बनेगा, जो रोमन कैथोलिक धर्म को मानने वाला होगा, बल्कि प्रोटेस्टेण्ट धर्म को मानने वाले व्यक्ति को ही राजा बनाया जाएगा।

संसद की सर्वोच्चता की स्थापना इंग्लैण्ड में गौरवपूर्ण क्रान्ति की सफलता के पश्चात् संसद की सर्वोच्चता स्थापित हो गई। इससे यह बात सिद्ध हो गई कि राजा को संसद की इच्छानुसार ही शासन करना चाहिए, क्योंकि जनता की प्रतिनिधि संसद की शक्ति अधिक है।

स्वतन्त्र न्यायपालिका की स्थापना इंग्लैण्ड में गौरवपूर्ण क्रान्ति की सफलता के पश्चात् न्यायपालिका की स्थापना की गई। इस प्रकार न्यायाधीश स्वतन्त्र होकर नियमानुसार कार्य करते थे, जिसके ऊपर राजा का कोई नियन्त्रण नहीं रहा। यूरोप में क्रान्तियों का प्रचलन इंग्लैण्ड में गौरवपूर्ण क्रान्ति की सफलता से प्रेरित होकर यूरोप में राजनीतिक क्रान्तियाँ प्रारम्भ हो गईं।

इंग्लैण्ड में संसदीय शासन का विकास उन्नीसवीं सदी में इंग्लैण्ड में संसदीय शासन व्यवस्था का विकास तीव्र गति से हुआ। इस सन्दर्भ में 1832 ई. में पहला सुधार अधिनियम पारित हुआ फलस्वरूप लोगों को मताधिकार प्राप्त हुआ। 1918 ई. में इंग्लैण्ड में महिलाओं को भी मताधिकार प्राप्त हो गया। इस प्रकार इंग्लैण्ड में संसदीय शासन व्यवस्था मजबूती से स्थापित हो गई और ब्रिटिश संसद विश्व की 'संसदों की जननी' कही जाने लगी।

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