: वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पर भारतीयों की प्रतिक्रिया

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पर भारतीयों की प्रतिक्रिया

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पर भारतीयों की प्रतिक्रिया

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर अंकुश लगाने के लिए 1978 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट पारित किया गया था। इस एक्ट की व्यापक निंदा की गई। इस एक्ट के अनुसार किसी खास भाषा के समाचार पत्रों को प्रतिबन्धित किया गया था। इस एक्ट में अंग्रेजी भाषा के समाचार पत्रों को शामिल नहीं किया गया था। राष्ट्रवादियों ने इसे दमनकारी एक्ट बताया। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार ऐसा कर राष्ट्रवादी गतिविधियों को रोकना चाहती थी, ताकि क्षेत्रीय समाचार पत्रों के माध्यम से राष्ट्रीयता की भावनाओं का विस्तार नहीं होने पाए। भारतीय नेताओं ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाना बताया इस अधिनियम की व्यापक निंदा की गई।

इल्बर्ट बिल

1873 ई. की फौजदारी दण्ड संहिता के अन्तर्गत किसी भी भारतीय न्यायाधीश को यूरोपीय अपराधियों को मुकदमा सुनने का अधिकार नहीं था। यह प्रावधान उच्च पदों पर आसीन भारतीयों के लिए असहनीय था। इन कमियों को दूर करने के लिए लॉर्ड रिपन के द्वारा अपनी परिषद् के विधि सदस्य इल्बर्ट की सहायता के लिए एक बिल पारित करने का प्रयास किया गया। इस बिल के प्रमुख प्रावधान थे— जाति विभेद पर आधारित सभी न्यायिक शक्तियों को समान किया जाए तथा भारतीय एवं यूरोपियों की न्यायिक शक्तियों को समान कर दिया जाए, लेकिन इस बिल को प्रस्तुत करने पर यूरोपियों ने घोर विरोध किया, जिससे इस बिल को वापस ले लिया गया। इस बिल के पास न होने से भारतीयों में राजनीतिक चेतना का संचार हुआ। इस राजनीतिक चेतना का प्रभाव राष्ट्रीय आन्दोलनों पर देखने को मिला।

इल्बर्ट बिल पर भारतीयों की प्रतिक्रिया

इल्बर्ट बिल को भारतीयों ने नस्लवादी एवं भेदभाव पूर्ण बताया था। इस बिल में यह प्रावधान था कि भारतीय न्यायाधीश को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमें की सुनवाई नहीं करनी चाहिए। इस बिल से भारतीयों में राष्ट्रवादिता की भावना और जागृत हुई। इस बिल को अपमान की नजर से देखा गया। इल्बर्ट बिल को एक विवादित अधिनियम इसलिए भी माना जाता है, क्योंकि इस अधिनियम के तहत यूरोपीय अपराधियों को कम दण्ड दिया जाता था, जबकि उसी अपराध के मामले में किसी भारतीय को अधिक दण्ड दिया जाता था।

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