विदेश नीति से तात्पर्य उस नीति से होता है, जिसके आधार पर किसी देश
के अन्य देशों के साथ राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक सम्बन्ध विकसित होते हैं।
जोसेफ फ्रेंकेल के अनुसार, “राष्ट्रहित विदेश नीति का आधारभूत सिद्धान्त है।" नेहरू के अनुसार, “किसी भी देश की विदेश नीति की आधारशिला उसके राष्ट्रीय हित की सुरक्षा है। "
भारतीय विदेश नीति की विशेषताएँ सिद्धान्त
भारत की विदेश नीति एक सम्प्रभु राष्ट्र की स्वतन्त्र विदेश नीति है, जो स्वतन्त्रता के उपरान्त देश के प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व निर्मित की गई तथा यह आज भी भारत के विदेशी सम्बन्धों की आधारशिला है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
गुट-निरपेक्षता की नीति
द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त शीत युद्ध का दौर चला, जिसमें विश्व दो महाशक्तियों के नेतृत्व में निर्मित सैन्य गुटों में बँट गया। पहला गुट, संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में था तथा दूसरा गुट, पूर्व सोवियत संघ के नेतृत्व में था।
इस स्थिति में भारत ने स्वतन्त्रता उपरान्त किसी भी गुट में शामिल न होकर गुट निरपेक्ष रहने का निर्णय लिया। यह नीति भारतीय विदेश नीति में सर्वोपरि है। यह नीति साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद की घोर विरोधी है।
भारतीय विदेश नीति विशेषताएँ सिद्धान्त
गुट निरपेक्षता की नीति पंचशील में आस्था
पंचशील के सिद्धान्त
शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में आस्था समस्त राष्ट्रों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों में विश्वास
साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का विरोध
रंगभेद नीति का विरोध
विश्व शान्ति तथा संयुक्त राष्ट्र में आस्था
देश के विकास हेतु किसी विशेष गुट में शामिल होने के बदले सभी देशों को सहयोग करना इस नीति का मूल आधार है। पण्डित नेहरू के शब्दों में, “गुट निरपेक्षता शान्ति का मार्ग और लड़ाई से बचाव का मार्ग है, इसका उद्देश्य सैन्य गुटों से दूर रहना है। "
पंचशील में आस्था
भारतीय विदेश नीति की पंचशील के सिद्धान्तों में गहन आस्था है। ये पंचशील सिद्धान्त बौद्ध दर्शन से प्रेरित हैं। वर्ष 1954 में भारत-चीन मैत्री सन्धि के अन्तर्गत इस सिद्धान्त की घोषणा की गई थी। वर्ष 1955 में बाण्डुंग सम्मेलन में तृतीय विश्व के 29 देशों ने तथा परवर्ती समय में संयुक्त राष्ट्र ने भी इसे स्वीकार किया।
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