» भारतीयों का उच्च पदों से वंचित होना 1833 ई. के अधिनियम मे वर्ग, जाति, धर्म आदि के भेदभाव के बिना सबको उच्च सेवाएँ देने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन 1858 ई. के अधिनियम मे जानबूुझ कर इस नीति को लागू नही किया गया। भारतीयों को खास उच्च सरकारी पदों से बाहर रखने के नियमित प्रयास किए जाने लगे थे; जैसे--इण्डियन सिविल सर्विस परीक्षा मे प्रवेश के लिए 21 वर्ष की आयु तथा परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी था।
प्रजातीय विभेद प्रजातीय विभेद अथवा नसस्लवाद ब्रिटिश साम्राज्यवाद एवं
राष्ट्रवाद के उदय के कारण
ब्रिटिश साश्राज्यवाद
धार्मिक ले सामाजिक सुधारको का योगदान
अग्रेजी शिक्षा
समाचार पत्रों का योगदान भारतीयो का उच्च पदों से बचित होना
अजातीय विभेद
आर्थिक शोषण
परिवहन तथा सचार साधनो का विकास
भारतीय शिक्षा संस्कृति का
अचार प्रसार
अन्य देशो मे स्वाधीनता की प्राप्ति
ओऔपनिवेशिक नीति का प्रमुख आधार
था। अग्रेज स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझते थे तथा भारतीयों को हीन समझते थे। 1857 ई. के विद्रोह के उपरान्त प्रजाति की शिष्टता की यह भावना और भी प्रबल हो गई। अग्रेजो का निवास स्थान भारतीयो के निवास स्थल से बिल्कुल अलग होता था।
भारतीयों के साथ हमेशा अनुचित एवं अशिष्ट व्यवहार किया जाता था। इन कारणो से धीरे धीरे भारतीयों के हृदय मे अग्रेजो की इस प्रजातीय श्रेष्ठता के विरुद्ध आक्रोश उभरने लगा। इस प्रजाति भेदभाव ने भारतीयो मे राष्ट्रीय चेतना जागृत करने मे अभूतपूर्व भूमिका अदा की।
आर्थिक शोषण 1813 ई. के अधिकार-पत्र में घोषित किया गया था “ब्रिटिश शासन का कर्त्तव्य है कि वह भारतीयों के सुख तथा समृद्धि का विकास करे,” किन्तु ब्रिटिश शासन ने भारत के सम्बन्ध मे जो आर्थिक नीति अपनाई, उसने देश को और दरिंद्र बना दिया। भारतीय उद्योगो को नष्ट कर, विदेशी माल को बढ़ावा दिया गया।
परिवहन तथा संचार साधनों का विकास ब्रिटिश शासन के द्वारा विकसित परिवहन एवं संचार के साधनो ने भारतीयो मे राष्ट्रीयता के विकास में प्रमुख योगदान दिया। इन संसाधनो के विकास से भारतीय आपस में मिलने लगे और ब्रिटिश राज्य की अपूर्णताओ और दोषो की समीक्षा करने में ये बहुत सहायक सिद्ध हुए। निःसन्देह अंग्रेजो ने रेल, सड़क, डाक, तार इत्यादि का विकास प्रशासनिक सुविधाओं के लिए किया, किन्तु इसका प्रभाव राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं ब नेताओं पर भी पड़ा।
भारतीय शिक्षा संस्कृति का प्रचार-प्रसार भारत मे एशियाटिक सोसायटी ने सर्वप्रथम आधुनिक भारत मे भारत सम्बन्धी अध्ययन विस्तृत रूप से करने आरम्भ किए। एशियाटिक सोसायटी से सम्बन्धित विद्वानू, जिनमे विलियम जोन्स प्रमुख थे, जिन्हें इतिहास मे प्राच्यवादी कहा जाता है, इन्होने भारतीय साहित्य का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करवाया। भारतीयों को इन्ही के माध्यम से भारत की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का ज्ञान हुआ, जिसके परिणामस्वरूप भारतीयों मे राष्ट्रप्रेम की भावना जाग्रत हुई।
अन्य देशों में स्वाधीनता की प्राप्ति यूरोप में 19वीं शताब्दी में राष्ट्रीयता तथा स्वतन्त्रता का जोर था। इस समय इटली और जर्मनी जैसे छोटे देश स्वतन्त्र हो गए थे, इनके स्वतन्त्र होने से भारतीयों में यह जागरूकता उत्पन्न हुई कि जब ये छोटे देश स्वतन्त्र हो सकते हैं, तो हम क्यो नहीं
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